The Shadow Outside My Window – मेरी खिड़की के बाहर खड़ी परछाई
कबीर एक छोटे से फ्लैट में अकेला रहता था।
उसके कमरे की खिड़की सामने वाली इमारत की तरफ खुलती थी।
हर रात ठीक 11:45 बजे उसे खिड़की के बाहर एक परछाई दिखाई देती।
पहले उसने सोचा कि शायद किसी पेड़ की शाखा होगी।
लेकिन एक रात उसने ध्यान से देखा।
परछाई किसी इंसान की थी।
लंबी।
बिल्कुल स्थिर।
और उसका चेहरा सीधे कबीर की खिड़की की तरफ था।
हर रात वही समय
कबीर ने कई दिनों तक उस परछाई को देखा।
वह हर रात आती।
ठीक 11:45 बजे।
और ठीक बारह बजे गायब हो जाती।
एक रात कबीर ने अपने दोस्त को वीडियो कॉल की।
उसने खिड़की की तरफ कैमरा घुमाया।
दोस्त ने पूछा—
"तू किस चीज़ को दिखा रहा है?"
कबीर ने कहा—
"वो आदमी! खिड़की के बाहर!"
दोस्त कुछ देर चुप रहा।
फिर बोला—
"भाई, तेरी खिड़की के बाहर तो कुछ भी नहीं है।"
शीशे पर उँगलियाँ
अगली रात कबीर ने खिड़की पर पर्दा लगा दिया।
वह बिस्तर पर लेट गया।
ठीक 11:45 बजे...
टक।
टक।
टक।
खिड़की पर दस्तक हुई।
कबीर ने सोचा कि शायद हवा होगी।
फिर किसी ने काँच पर उँगली से कुछ लिखा।
उसने पर्दा हटाया।
काँच पर धुंध के बीच शब्द लिखे थे—
"मुझे अंदर आने दो।"
कबीर ने घबराकर पीछे कदम लिया।
वह सातवीं मंज़िल पर रहता था।
खिड़की के बाहर कोई कैसे खड़ा हो सकता था?
कैमरे में कैद परछाई
अगले दिन कबीर ने खिड़की के सामने एक कैमरा लगा दिया।
वह उस रात सोया नहीं।
11:45 बजे परछाई फिर दिखाई दी।
इस बार उसने अपना हाथ उठाया।
और खिड़की पर तीन बार दस्तक दी।
कबीर ने तुरंत कैमरे की रिकॉर्डिंग चेक की।
स्क्रीन पर उसका कमरा खाली था।
लेकिन आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी।
टक।
टक।
टक।
फिर रिकॉर्डिंग में एक फुसफुसाहट सुनाई दी—
"तुम मुझे देख सकते हो, कबीर। लेकिन तुम यह नहीं जानते कि मैं कहाँ हूँ।"
पुरानी इमारत का राज़
कबीर अगले दिन सामने वाली इमारत के चौकीदार से मिला।
उसने अपनी खिड़की के सामने दिखाई देने वाली परछाई के बारे में बताया।
चौकीदार का चेहरा अचानक उतर गया।
उसने कहा—
"साहब, सामने वाली इमारत तो पाँच साल पहले खाली करवा दी गई थी। वहाँ कोई नहीं रहता।"
कबीर ने पूछा—
"क्यों?"
चौकीदार ने धीमी आवाज़ में बताया कि उसी इमारत की एक खिड़की के पास एक आदमी की मौत हुई थी।
वह हर रात अपनी खिड़की से सामने वाले फ्लैट को देखता रहता था।
और मरने से पहले उसने बार-बार कहा था—
"वह आदमी मेरे कमरे में आ चुका है।"
परछाई अब अंदर थी
उस रात कबीर ने खिड़की की तरफ देखना बंद कर दिया।
उसने सभी लाइटें जला दीं।
फिर भी कमरे में अजीब ठंड बढ़ने लगी।
अचानक उसके पीछे से आवाज़ आई—
"अब खिड़की देखने की ज़रूरत नहीं।"
कबीर धीरे-धीरे पलटा।
दीवार पर उसकी अपनी परछाई दिखाई दे रही थी।
लेकिन कबीर स्थिर खड़ा था।
उसकी परछाई अपना सिर घुमा रही थी।
और मुस्कुरा रही थी।
आखिरी रिकॉर्डिंग
अगली सुबह कबीर का फ्लैट खुला मिला।
कमरे में सब कुछ अपनी जगह पर था।
मोबाइल मेज़ पर रखा था।
कैमरा चालू था।
लेकिन कबीर गायब था।
कैमरे की आखिरी रिकॉर्डिंग में कबीर खिड़की के सामने खड़ा दिखाई देता है।
वह धीरे-धीरे कैमरे की तरफ मुड़ता है।
फिर मुस्कुराकर कहता है—
"अब अगली खिड़की तुम्हारी है।"
उसके पीछे दीवार पर दो परछाइयाँ थीं।
एक कबीर की।
और दूसरी किसी ऐसे इंसान की, जो कमरे में दिखाई ही नहीं दे रहा था।
कई लोग ऐसी घटनाओं को real horror story in hindi की तरह पढ़ना पसंद करते हैं।
लेकिन अगर horror story in hindi में सबसे डरावनी बात वह हो जो दिखाई न दे, तो कबीर की कहानी का अंत और भी खौफनाक है।
क्योंकि कुछ unexpected stories में डर खिड़की के बाहर नहीं खड़ा होता...
वह चुपचाप हमारे पीछे आकर खड़ा हो जाता है।
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