The Train That Stopped at No Station – वह ट्रेन जो किसी स्टेशन पर नहीं रुकती थी
रात के करीब बारह बजे रोहित दिल्ली से अपने घर लौट रहा था।
आखिरी मेट्रो निकल चुकी थी।
स्टेशन पर सिर्फ़ कुछ लोग बचे थे।
तभी प्लेटफॉर्म पर एक अनाउंसमेंट हुई—
"अगली ट्रेन कुछ ही देर में प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर आएगी।"
रोहित हैरान था।
प्लेटफॉर्म नंबर तीन तो पिछले दो साल से बंद था।
उसने वहाँ देखा।
अँधेरे के बीच एक ट्रेन धीरे-धीरे उसकी तरफ आ रही थी।
उसकी खिड़कियों में कोई रोशनी नहीं थी।
और ट्रेन के ऊपर लगे डिस्प्ले पर सिर्फ़ एक शब्द लिखा था—
"वापसी।"
खाली प्लेटफॉर्म
रोहित ने आसपास देखा।
कोई दूसरा यात्री उस ट्रेन का इंतज़ार नहीं कर रहा था।
उसने स्टेशन के गार्ड से पूछने का सोचा।
लेकिन गार्ड की कुर्सी खाली थी।
तभी ट्रेन उसके सामने आकर रुक गई।
दरवाज़े अपने आप खुल गए।
अंदर से एक ठंडी हवा बाहर आई।
रोहित ने मोबाइल देखा।
नेटवर्क गायब था।
उसने सोचा कि शायद यह कोई स्पेशल ट्रेन होगी।
और वह अंदर चढ़ गया।
ट्रेन के अंदर
ट्रेन में सभी सीटें खाली थीं।
हर खिड़की के बाहर घना अँधेरा था।
रोहित ने एक सीट चुनकर बैठ गया।
कुछ देर बाद स्पीकर से आवाज़ आई—
"अगला स्टेशन... वह जगह जहाँ आप आखिरी बार गए थे।"
रोहित को यह अनाउंसमेंट अजीब लगी।
तभी ट्रेन चल पड़ी।
उसने खिड़की से बाहर देखा।
वहाँ कोई स्टेशन नहीं था।
सिर्फ़ अँधेरा था।
सामने बैठा यात्री
कुछ मिनट बाद रोहित ने सामने की सीट पर एक आदमी को बैठे देखा।
वह आदमी पुराने कपड़े पहने हुए था।
उसका चेहरा नीचे झुका हुआ था।
रोहित ने पूछा—
"आप कहाँ जा रहे हैं?"
आदमी ने धीरे से सिर उठाया।
उसका चेहरा देखकर रोहित के हाथ काँपने लगे।
वह आदमी बिल्कुल उसके पिता जैसा दिखता था।
लेकिन उसके पिता की मौत पाँच साल पहले हो चुकी थी।
आदमी मुस्कुराया और बोला—
"तुम्हें आने में बहुत देर हो गई, बेटा।"
वह स्टेशन जो यादों में था
रोहित अपनी सीट से उठ गया।
उसने कहा—
"आप मेरे पापा नहीं हो सकते!"
आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया।
बस खिड़की की तरफ इशारा किया।
रोहित ने बाहर देखा।
इस बार ट्रेन एक पुराने घर के सामने से गुजर रही थी।
वह उसका बचपन का घर था।
वही आँगन।
वही नीम का पेड़।
और दरवाज़े पर खड़ी उसकी माँ।
रोहित की आँखों में आँसू आ गए।
उसकी माँ की मृत्यु भी कुछ साल पहले हो चुकी थी।
तभी स्पीकर से आवाज़ आई—
"अगला स्टेशन... आखिरी मौका।"
ट्रेन का असली नियम
रोहित ने दरवाज़े की तरफ भागने की कोशिश की।
लेकिन दरवाज़े बंद थे।
उसने सामने बैठे आदमी से पूछा—
"मुझे यहाँ से उतारो!"
आदमी ने कहा—
"इस ट्रेन में चढ़ना आसान है। उतरने के लिए तुम्हें सच याद करना होगा।"
रोहित का सिर दर्द से फटने लगा।
अचानक उसे याद आया कि बचपन में एक रात वह घर से नाराज़ होकर भाग गया था।
उसके पिता उसे ढूँढ़ने निकले थे।
रास्ते में उनकी दुर्घटना हो गई थी।
रोहित ने हमेशा खुद को उनकी मौत का ज़िम्मेदार माना था।
लेकिन उसने यह बात कभी किसी से नहीं कही।
आखिरी स्टेशन
ट्रेन अचानक रुक गई।
दरवाज़े खुल गए।
बाहर वही पुराना रेलवे स्टेशन था, जहाँ उसके पिता की दुर्घटना हुई थी।
आदमी ने कहा—
"तुम्हारी गलती नहीं थी, रोहित। अब खुद को सज़ा देना बंद करो।"
रोहित की आँखों से आँसू बहने लगे।
उसने एक कदम बाहर रखा।
फिर पीछे मुड़कर देखा।
ट्रेन में अब कोई नहीं था।
सिर्फ़ सामने की सीट पर एक पुरानी तस्वीर रखी थी।
तस्वीर में रोहित अपने पिता के साथ मुस्कुरा रहा था।
सुबह रोहित स्टेशन की बेंच पर जागा।
उसे नहीं पता था कि वह वहाँ कैसे पहुँचा।
उसके हाथ में वही पुरानी तस्वीर थी।
स्टेशन के कर्मचारी ने बताया कि रात को कोई ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर नहीं आई थी।
वह प्लेटफॉर्म तो सालों से बंद था।
रोहित ने उस तस्वीर को संभालकर अपने बटुए में रख लिया।
कुछ घटनाएँ इंसान की सोच बदल देती हैं।
और कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें लोग real horror story in hindi कहकर सुनाते हैं।
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क्योंकि कुछ यात्राएँ मंज़िल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं...
वे हमें उस सच तक पहुँचाती हैं, जिससे हम सालों से भाग रहे होते हैं।
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