The Letter Delivered After Fifty Years – पचास साल बाद आया खत
अभिषेक अपने दादाजी का पुराना घर साफ़ कर रहा था।
घर में बहुत-सी पुरानी किताबें और तस्वीरें थीं।
अलमारी के पीछे उसे एक पीला लिफाफा मिला।
उस पर उसके दादाजी का नाम लिखा था।
लिफाफे पर डाक की मुहर लगी थी।
लेकिन तारीख देखकर अभिषेक हैरान रह गया।
यह खत पचास साल पहले भेजा गया था।
उसने लिफाफा खोला।
अंदर सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—
"मैं आज रात घर लौट रही हूँ। दरवाज़ा खुला रखना।"
दादाजी का बदला हुआ चेहरा
अभिषेक ने खत दादाजी को दिखाया।
खत पढ़ते ही उनका चेहरा पीला पड़ गया।
उन्होंने काँपते हाथों से लिफाफा लिया और कहा—
"यह तुम्हें कहाँ मिला?"
अभिषेक ने बताया।
दादाजी ने खत जलाने की कोशिश की।
लेकिन माचिस जलते ही बुझ गई।
उन्होंने घबराकर कहा—
"आज रात इस घर में कोई दरवाज़ा नहीं खोलेगा।"
आधी रात की दस्तक
रात को पूरा परिवार सो गया।
अभिषेक की आँखें खुली थीं।
ठीक बारह बजे दरवाज़े पर दस्तक हुई।
ठक...
ठक...
ठक...
बाहर से एक औरत की आवाज़ आई—
"मैं लौट आई हूँ।"
अभिषेक ने दादाजी के कमरे की तरफ देखा।
वह बिस्तर पर बैठे काँप रहे थे।
आवाज़ फिर आई—
"तुमने वादा किया था कि दरवाज़ा खुला रखोगे।"
दादाजी ने दोनों हाथों से कान ढक लिए।
पुरानी तस्वीर का राज़
अगली सुबह अभिषेक ने घर की पुरानी तस्वीरें देखीं।
एक तस्वीर में दादाजी के साथ एक युवती खड़ी थी।
तस्वीर के पीछे उसका नाम लिखा था—
सुधा।
अभिषेक ने पूछा कि वह कौन थी।
दादाजी ने बताया कि सुधा उनकी बचपन की दोस्त थी।
पचास साल पहले दोनों की शादी होने वाली थी।
लेकिन शादी से एक दिन पहले सुधा अचानक गायब हो गई।
किसी को उसका पता नहीं चला।
दादाजी ने कभी शादी नहीं की।
अभिषेक ने पूछा—
"लेकिन खत में तो लिखा है कि वह लौट रही है।"
दादाजी ने धीमे से कहा—
"वह लौटने का वादा करके गई थी।"
बंद कमरे की चाबी
उस रात अभिषेक ने घर के उस कमरे की तलाश की, जिसे दादाजी हमेशा बंद रखते थे।
दरवाज़े पर पुराना ताला लगा था।
उसे चाबी खत के लिफाफे में मिली।
अंदर एक छोटी मेज़, कुर्सी और कई खत रखे थे।
सभी खत सुधा के नाम लिखे गए थे।
आखिरी खत पर लिखा था—
"अगर तुम वापस आईं, तो मैं तुम्हें पहचान लूँगा।"
तभी पीछे से किसी ने कहा—
"क्या सच में?"
अभिषेक पलटा।
दरवाज़े पर एक बूढ़ी औरत खड़ी थी।
उसके हाथ में वही पुराना लिफाफा था।
वादा पूरा हुआ
अभिषेक ने दादाजी को बुलाया।
दादाजी कमरे में आए।
औरत को देखते ही उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्होंने धीरे से कहा—
"सुधा..."
औरत मुस्कुराई।
"तुमने दरवाज़ा खुला क्यों नहीं रखा?"
दादाजी ने जवाब दिया—
"मैं हर रात तुम्हारा इंतज़ार करता रहा।"
औरत ने उनका हाथ पकड़ लिया।
उसी पल कमरे की घड़ी रुक गई।
जब अभिषेक ने पलक झपकाई, दोनों गायब थे।
मेज़ पर दो खत रखे थे।
एक पर लिखा था—
"अब इंतज़ार खत्म हुआ।"
दूसरे पर अभिषेक का नाम था।
उसमें सिर्फ़ एक वाक्य था—
"जब तुम्हारा समय आएगा, हम फिर मिलेंगे।"
अगर आप real horror story in hindi जैसी कहानियाँ पसंद करते हैं, तो पचास साल पुराने इस खत का रहस्य आपको भी भावुक कर सकता है।
क्योंकि कुछ खत देर से पहुँचते हैं...
लेकिन कुछ वादे समय से कभी हारते नहीं।
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