सुनसान हवेली का आख़िरी मेहमान – भाग 2
रात 11 बजे के बाद सब कुछ बदल गया रात के लगभग ग्यारह बज चुके थे। हवेली के अंदर सन्नाटा इतना गहरा था कि चारों दोस्तों की साँसों की आवाज़ तक सुनाई दे रही थी। रोहित के चाचा ने घड़ी देखी। 11:02 उन्होंने मज़ाक में कहा, "लगता है गाँव वालों की कहानियाँ सिर्फ डराने के लिए थीं।" इतना कहते ही ऊपर की मंज़िल से किसी के धीरे-धीरे चलने की आवाज़ आने लगी। टक... कुछ सेकंड का सन्नाटा... टक... फिर एक और कदम... ऐसा...
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